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सेक्किलार स्वामी – ऐतिहासिक परिचय

    
सेक्किलार स्वामी का जन्म तोंडै नाडु के कुंड्रतूर नगर में हुआ। तोंडै नाडु आज के तमिल नाडु और आन्द्र प्रदेश के उस भाग को कहते है जहाँ पल्लव राज्य करते थे । यह क्षेत्र विद्वानों के लिए प्रसिद्ध था । सेक्किलार स्वामी का परिवार शैव मत का अनुयायी था और कृषि कार्य करता था । उनके छोटे भाई पाल्लरावायर थे और उनका परिवार सेक्किलार परंपरा का अनुसरण करता था । चोला राजा कुलोतुंग - II (अनपाय), जिनका शासन काल था, सेक्किलार स्वामी की बुद्धिमता, सच्चाई और उत्कृष्टता देखकर प्रभावित हुए । उन्होंने सेक्किलार को प्रधान मंत्री नियुक्त किया और उन्हे ‘उत्तम चोला पल्लवर’ की उपाधि से सम्मानित किया। सेक्किलार भगवान शिव के भक्त थे और विशेष रूप से नागेश्वरम नाम से प्रसिद्ध मंदिर में सेवा करते थे । अपने जन्म स्थान कुंड्रतूर में इन्होंने मंदिर का निर्माण कर, भगवान शिव को नागेश्वरम के रूप में भी प्रतिष्ठित किया ।  

सेक्किलार स्वामी – महान शिवभक्त
सेक्किलार स्वामी - राजा का चामर सेवा 


राजा अनपाय कला के पारखी थे। वे ‘जीविका चिंतामणी’ जैसे तमिल भाषा रचनाओं की प्रशंसा करते थे। एक निष्ठावान मंत्री होने के कारण सेक्किलार ने अपने कर्तव्य का पलन करते हुए राजा को परामर्श दिया कि ‘जीविका चिंतामणी’ जैसी रचनाएं इहलोक और परलोक दोनों के लिए व्यर्थ हैं । पूछे जाने पर सेक्किलार ने सुझाव दिया की राजा को अपना जीवन सार्थक बनाने के लिए, शिव भक्तों के बारे में पढ़ कर उनके दिखाए मार्ग पर चलना चाहिए। सेक्किलार ने राजा को सुंदरमूर्ति नायनार के तिरुतोंडर तोकै, जिसे नंबियांडार नम्बि ने तिरुतोंडर तिरुवंतादि नाम से गाया था, पढ़ने के लिए प्रेरित किया । राजा इन कृत्यों से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने सेक्किलार को इन शिव भक्तों के बारे में विस्तृत रूप से लिखने का काम सौंपा ।      


सेक्किलार ने इस महत्वपूर्ण कार्य को आरंभ करने से पहले, चिदंबरम में भगवान की, नटराज रूप में, आराधना की । इससे प्रसन्न हो कर स्वयं भगवान शिव ने इस रचना को आशीर्वाद देते हुए उसका पहला शब्द प्रदान किया – ‘उलकेलाम’ । इसे मंगलाचरण मानकर सेक्किलार ने इस शब्द का उपयोग ग्रन्थ के आरंभ, मध्य और अंत में किया है । चिदंबरम में इकट्ठे पंडित, साधु और जन समुदाय की एक बड़ी सभा में पेरिय पुराण को प्रथम बार प्रस्तुत किया गया। सभा के पश्चात, राजा ने सेक्किलार को राजकीय हाथी पर शोभायात्रा से सम्मानित किया और अपने हाथों से चामर सेवा की थी। उन्होंने पेरिय पुराण को बरहवाँ तिरुमुरै घोषित किया। 


पेरिय पुराण का दूसरा नाम तिरुतोंडर पुराण है और संभवत: यह सेक्किलार स्वामी की एक मात्र रचना है । पेरिय पुराण लिखने के पश्चात सेक्किलार ने अपना शेष जीवन ६३ नायनमारों के दिखाए शिव भक्ति के मार्ग पर चल कर भगवान शिव के चरण प्राप्त किया ।

सेक्किलार के अन्य नाम – अरुन्मोलि देवर (वास्तविक नाम), तोंडर सीर् परवुवार, उत्तम चोला पल्लवर 

                                        
गुरु पूजा :  वैकासी/पूसम या  वृषभ/पुष्य

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हर हर महादेव 
 

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