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शिवरात्रि व्रत - इतिहास, विधि, समय, आचरण

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शिवरात्रि भगवान शिव के भक्तों के लिए सबसे शुभ व्रतों में से एक है। पुराणों में इस व्रत की महानता का वर्णन किया गया है। स्कन्द महापुराण में विशेष रूप से इस व्रत की विधि को विस्तृत किया गया है।

पौराणिक कथा  

पुराण काल में एक समय जब सम्पूर्ण सृष्टि भगवान शिव में विलीन हो गया और दिशाएं अंधकार से व्याप्त थी, तब माता पार्वती ने आगमों के अनुसार भगवान शिव की आराधना की। परमेश्वर ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया। माता ने भविष्य में सभी प्राणियों के कल्याण हेतु, यह वर मांगा कि जो कोई भी शिवरात्रि के दिन भक्ति के साथ भगवान की पूजा करेगा, उसे परम मोक्ष प्राप्त होगा। पशुपति ने इसे प्रदान किया और हम सभी के लिए सरलता से मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त किया। 

एक समय जब ब्रह्मा और विष्णु में परस्पर श्रेष्ठता का युद्ध चल रहा था, तब भगवान शिव उनके समक्ष अग्नि के अनंत स्तंभ के रूप में प्रकट हुए। इस दिन, जब अग्नि का स्तंभ प्रकट हुआ, इसे तिरु-कार्तिकै (कार्तिक पूर्णिमा) के रूप में मनाया जाता है। ब्रह्मा और महाविष्णु उस स्तंभ के आरंभ और अंत नहीं ढूंढ पाए। अपनी मूर्खता का  पश्चाताप करते हुए दोनों ने भगवान शिव से क्षमा प्रार्थना के लिए उनकी पूजा की। जिस रात भगवान शिव ने ज्वाला स्तम्भ से एक लिंग रूप में उनके समक्ष प्रकट होकर उन्हें आशीर्वाद दिया, उसी रात को शिवरात्रि माना जाता है। इसी कारण से महाशिवरात्रि के अर्ध रात्री के समय लिंगोद्भव काल के नाम से प्रसिद्ध है। 

भक्त पूर्ण रात्रि भगवान का अभिषेक, उनके पवित्र नामों का जाप और अन्य पावन कर्म करके प्रार्थना करते हैं। प्रत्येक मास के कृष्ण-पक्ष की चतुर्दशी को मासिक शिवरात्रि कहा जाता है। माघ मास (तमिल मास-मासी, मध्य फरवरी से मध्य मार्च) में आने वाली शिवरात्रि को महा शिवरात्रि कहा जाता है। शिवभक्तों में यह सबसे महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। 

महा शिवरात्रि की महानता का वर्णन कई पौराणिक एवं लोक कथाओं से प्राप्त हैं। 

एक दिन एक व्याध, असफल आखेट के पश्चात रात में थका और भूखा था, एक बाघ ने उसका पीछा किया। वह बाघ से बचने के लिए एक पेड़ पर चढ़ गया। संजोग से वह एक बिल्व वृक्ष था। बाघ पेड़ के नीचे बैठ गया और उसके नीचे आने की प्रतीक्षा कर रहा था। पेड़ की एक शाखा पर बैठे व्याध को पता था कि वह सो नहीं सकता। रात व्यतीत करने के लिए वह पत्तियों को तोड़कर नीचे गिराने लगा। पेड़ के नीचे एक शिवलिंग था। इस प्रकार पूर्ण रात्रि समाप्त हुई। भगवान व्याध और बाघ दोनों द्वारा अनजाने में किए गए उपवास और पूजा से प्रसन्न थे। अपनी असीम कृपा से, उन्होंने व्याध और बाघ को मोक्ष प्रदान किया। 

एक शुभ महाशिवरात्रि के समय शिव के मंदिर में, वेदी पर दीपक मन्द जल रहा था। उस समय एक चूहा अपने शिकार को पकड़ने वहाँ आया और उसने बाती को स्पर्श कर लिया। ऊष्ण के कारण उसने तुरंत अपना शीर्ष हिलाया। इस प्रक्रिया में उसने दीपक के बाती को पुनः प्रज्वलित कर दिया और वेदी देदीप्यमान हो उठी। भगवान शिव ने इस कार्य से प्रसन्न होकर चूहे को प्रसिद्ध असुर राजा महाबली बना दिया। हमारे पुराणों में इस प्रकार कई घटनाओं का वर्णन है। सभी कथाओं ने इस विषय की पुष्टि की है कि शुद्ध भक्ति और प्रेम के साथ किया गया यह व्रत सर्वशक्तिमान की कृपा सुनिश्चित करता है।

शिवरात्रि – विधि समय  

स्कंद पुराण में चार शिवरात्रियों का वर्णन किया गया है। पहली नित्य शिवरात्रि अर्थात प्रतिदिन अर्धरात्रि मनाई जाने वाली शिवरात्रि है। दूसरी मासिक शिवरात्रि है, जो प्रत्येक मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है। तीसरी माघ प्रथमादि शिवरात्रि है, जो माघ (तमिल - मासी) मास में कृष्ण पक्ष के प्रथमा तिथि से प्रारंभ होकर तेरह दिनों तक मनाई जाती है और चतुर्दशी की पूर्ण रात भगवान की पूजा के साथ समाप्त होती है। चौथी माघ (मासी) महीने में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात को मनाई जाती है। इस शिवरात्रि का पालन सबसे व्यापक है और इसे महा शिवरात्रि कहा जाता है।

शिवरात्रि – विधि आचरण 

महाशिवरात्रि के दिन, सुबह शीघ्र उठकर, सहस्र भव्य मालाओं से सुसज्जित, महालिंग के रूप में उन अनंत मंगल का ध्यान किया जाता है। स्नान से शरीर शुद्धि के पश्चात, रात के चार काल (रात के चार एक समान समय अंतराल) में शिवलिंग के रूप में भगवान शिव की पूजा की जाती है। इस व्रत के लिए शिवलिंग की पूजा का स्पष्ट उल्लेख किया गया है क्योंकि यह वह समय है जब भगवान अपनी कृपा से, पशुओं के मंगल के लिए एक "निराकार-रूप" लिंग मूर्ति में प्रकट हुए थे।


शिवरात्रि – चार काल समय 

चार काल पूजा का समय इस प्रकार है -
पहली पूजा - शाम 6:30 - 9.30 बजे;
दूसरी पूजा – रात 9:30 - 12.30 बजे;
तीसरी पूजा – रात 12:30 - 03.30 बजे;
चौथी पूजा - सुबह 3:30 - 6:30 बजे। 

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2. Shivaratri Vrata - Why? How to observe?
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