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कारैकाल अम्मैयार नायनार दिव्य चरित्र

तमिल भूमि के पूर्वी तट पर, चोल राज्य में कारैकाल का प्रसिद्ध नगर था। उन दिनों कारैकाल एक महत्वपूर्ण पत्तन था जहाँ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के कारण व्यापारी दूर देशों से बहुत सारी संपत्ति लाते थे और नगर सम्पन्न था। कारैकाल के प्रमुख व्यापारियों में से एक, धनदत्त, की एक बालिका हुई - जो उनके तप का वर स्वरूप थी। माँ लक्ष्मी के समान सुन्दर, उस बालिका का नाम पुनितवती रखा गया। चलना सीखने के साथ-साथ उसने प्रभु की सेवा करना भी सीखा। जब उसने बात करना आरंभ किया, तो उसके पंखुड़ी जैसे ओष्ठ केवल भगवान के नृत्य के बारे में बात करते थे, जो शब्दों से परे है। जैसे एक कलिका उत्तम पुष्प में विकसित होती है, वैसे ही पुनितवती एक उत्कृष्ट युवती के रूप में बड़ी हुई। वह उन निष्कलंक भगवान के चरणों के पुष्पों के समान सुंदर थी।

Karaikkal Ammaiyar - The History of Karaikkal Ammaiyar (Peyaar)
कारैकाल की माँ, भक्तों के लिए माँ समान, स्वयं शिवजी के लिए माँ का प्यार रखनेवाली!

नागपट्टिनम के निधिपति नाम के एक प्रसिद्ध व्यापारी थे, जिनका परमदत्त नामक एक पुत्र था। उनके स्वजनों ने धनदत्त के पास पुनितवती के लिए परमदत्त के विवाह का प्रस्ताव लाया। हर्षोल्लास के साथ दोनों पक्ष विवाह के लिए संमत हो गए और एक शुभ तिथी का चयन किया। विवाह पारंपरिक विधि से हुआ जिससे दोनों परिवार प्रसन्न हुए। धनदत्त अपनी एकमात्र संतान से दूर नहीं रहना चाहते थे। इसलिए, निधिपति के समर्थन से, उन्होंने दंपति के लिए कारैकाल में ही घर-गृहस्ती स्थापित कर दी और उन्हें पर्याप्त धन प्रदान किया। परमदत्त ने अपनी कार्यकुशलता से उस धन को कई गुणा बढ़ा दिया और परिवार की देखभाल करते हुए अपनी पवित्र, प्रेमपूर्ण और समर्पित पत्नी के साथ आनंद से रहने लगे। पुनितवती ने पारिवारिक जीवन के सभी कर्तव्यों को अच्छे से निभाया और शिवभक्तों को आश्रय दिया । प्रेम स्वरूप भगवान के प्रति अत्याधिक श्रद्धा के साथ वे उन भगवत भक्तों को भोजन और अन्य वस्तुएं प्रदान करतीं थीं। 

एक दिन, परमदत्त से मिलने कुछ लोग आए थे और उन्होंने उन्हे दो आम दिये। उन्होंने इसे अपने सेवक के माध्यम से अपने घर भेज दिया। उनकी कर्तव्यपरायण पत्नी ने दोनों आमों को घर में सुरक्षित रख लिया। उसी समय पन्नगभूषित भगवान का एक सेवक भूख से व्याकुल होकर घर के द्वार पर आया। पुनितवती ने उनका स्वागत किया और उनकी भूख मिटाने के लिए भोजन परोसा। अतिरिक्त व्यंजन की कमी को पूरा करने के लिए, उन्होंने अपने पति द्वारा दिए गए दो आमों में से एक को भोजन के साथ परोस दिया। उनके मन में भक्त की सेवा से बढ़कर और कुछ नहीं था। उनकी सेवा के लिए आशीर्वाद देते हुए शिवभक्त, जिनकी आयु से संबंधित थकान और भूख अच्छे भोजन और मीठे आम के कारण को दूर हो गये, अपने मार्ग पर चले गये। कुछ देर पश्चात, मध्यान के समय, पुनितवती के प्रिय पति घर आये। स्नान के पश्चात वे मध्यान के भोजन के लिए बैठे। पत्नी ने प्रेम से पति को बचे हुए आम के साथ अच्छा भोजन परोसा। फल के अनोखे स्वाद ने उन्हे दूसरे फल को भी खाने के लिए प्रेरित किया। पुनितवती उस जगह से ऐसे चली गई जैसे वे दूसरा आम लेने जा रही हो। किन्तु वे चिंतित थीं – अब क्या करें? उन्होंने भक्तों के एक मात्र आश्रय प्रभु से प्रार्थना की। भगवत कृपा से उनके हाथ में अद्भुत स्वादु आम प्रकट हुआ। वे इसे अपने पति के पास ले आईं। अमृत से भी अधिक स्वादिष्ट आम ने परमदत्त को आश्चर्यचकित कर दिया और उन्होंने पूछा कि यह स्वर्गीय आम कहाँ से प्राप्त हुआ। वे समझा न सकी क्योंकि भगवान की कृपा को समझना कठिन है, किन्तु उसे लगा कि पति को उत्तर दिये बिना रहना भी ठीक नहीं था। सच बोलने का दृढ़ निश्चय करके, मन ही मन भगवान के चरणों में प्रार्थना करते हुए, उन्होंने सब कुछ बता दिया। यह स्वीकार करने में असमर्थ कि यह सर्वशक्तिमान की कृपा थी, परमदत्त ने उन्हे भगवान से एक और फल प्राप्त करके इसे सिद्ध करने के लिए कहा। उन्होंने श्मशानवासी भगवान से विनती की कि यदि उन्हे वह आम पुनः नहीं मिल तो उनकी बातें असत्य मानी जाएंगीं। तुरंत उनके हाथ में एक आम आ गया। जब कांपते हुए परमदत्त ने उस आम को अपने हाथों में लिया, तो आम अदृश्य हो गया। भय और सम्मान की मिश्रित भावनाओं के साथ, परमदत्त ने उस क्षण से उन्हे स्पर्श न करने का निर्णय ले लिया। एक दिन, दूर देशों की यात्रा से धनोपार्जन हेतु, वे साथी व्यापारियों के साथ उस नगर से प्रस्थान कर गए। अपनी यात्राओं से बहुत सारा धन अर्जित करके पाण्ड्य राज्य के एक व्यापारी की पुत्री से विवाह कर वहीं निवास करने लगे। पुनितवती की स्मृति को आदरपूर्वक अपने मन में जीवित रखते हुए वे बिना किसी के जाने वहाँ रहने लगे। अपनी पूर्व पत्नी को देवी मानते हुए उनकी स्मृति में उन्होंने अपनी पुत्री का नाम पुनितवती रख दिया।

इसी समय कारैकाल  में, परमदत्त की निर्दोष पत्नी उनकी प्रतीक्षा करते हुए भगवान के भक्तों की निरंतर सेवा कर रही थी। एक दिन उन्हे पता चला कि उनके पति बहुत सारा धन अर्जित कर पाण्ड्य राज्य में रह रहे थे। बंधुओं ने उन्हे परमदत्त के पास ले जाने का निर्णय लिया। अपने आगमन के बारे में पहले से ही सूचित कर, वे सब पाण्ड्य राज्य के नगर गए। भय और श्रद्धा के साथ, अपनी पत्नी और पुत्री संग, परमदत्त प्रणाम करने के लिए आगे बढ़े। तीनों ने पुनितवती के चरणों में प्रणाम किया। परमदत्त ने कहा कि उनका जीवन केवल पुनितवती का आशीर्वाद था और उनके पुत्री का नाम उन्ही का दिव्य नाम था। पुनितवती निस्तब्ध रह गई और तुरंत पीछे हट गई। वहाँ उपस्थित स्तंभित बंधुजनों को परमदत्त ने बताया कि पुनितवती कोई साधारण स्त्री नहीं अपितु देवी समान पूजनीय थी। परमदत्त ने सभी से अनुरोध किया कि वे सभी पुनितवती की पूजा करें। जहाँ बंधुजन इन शब्दों से भयभीत थे, उस उत्कृष्ट गुणों वाली सुंदर युवा स्त्री ने ब्रह्मांड को विष से बचाने वाले भगवान नीलकंठ से प्रार्थना की, "यदि मेरे पति का यह निर्णय है, तो आप कृपा कर इस शरीर द्वारा प्राप्त सुंदरता को हर लें और मुझे एक कंकाल देह दें जो सदैव आपकी स्तुति करता रहें।'' मृत्युंजय भगवान की दया से, उन्होंने अपना सुंदर शरीर त्याग कर एक कंकाल देह प्राप्त किया जिसकी आज भी सभी लोकों में पूजा की जाती है। वहां जो बंधुजन उपस्थित थे वे विचलित हो गए; उन्होंने कारैकाल अम्मैयार को प्रणाम किया और वहाँ से प्रस्थान कर गए। जब आत्मा का संयोग शिव के साथ होता है तो ज्ञान झरने के समान प्रवाह करने लगता है। यही अम्मैयार के "अद्भुत तिरु अन्तादी" के रूप में प्रकट हुआ, जिसमे वे गातीं हैं कि वे उन गणों के साथ एक हो गईं हैं जो भगवान के चरण-कमल में नित्य स्तुति करते हैं। तद्पश्चात उन्होंने "इरट्टै मणि मालै अंतादी" (20 पद्य की रचना जिसमे एकांतरिक पद्य की शैली समान होती है) की रचना की। कैलाश पर्वत की सीमा में प्रवेश करने की प्रबलेच्छा से, जहां बंधन रूपी तीन दुर्गों को नष्ट करने वाले भगवान त्रिपुरांतक निवास करते हैं, वे आगे बढ़ीं। मार्ग में जन उनके कंकाल रूप को देखते ही डर कर भाग जाते थे। किन्तु उन महान भक्त ने यह कहकर उनकी ओर ध्यान नहीं दिया कि, जब स्वयं महादेव ने उन्हें आशीर्वाद दिया तो उन्हें इस बात की चिंता क्यों हो कि अज्ञानता के अंधेरे में मग्न लोग उनके रूप के विषय में क्या सोचते हैं। वे उस पवित्र शिखर के परिवेश में पहुँची। सर्वशक्तिमान भगवान के उस निवास पर अपने पैर रखना उन्हे स्वीकार नहीं था इस लिए वे अपने शीर्ष के बल पर पर्वतारोहण करने लगीं।

जगन्माता, जो स्वयं परम शिवभक्त है और सदैव भगवान के साथ रहती हैं, ने कारैकाल अम्मैय्यार की भक्ति से विस्मित होकर भगवान से पूछा, "यह कैसा प्रेम है? यह कौन है जो कंकाल शरीर के साथ इस पवित्र पर्वत पर शीर्ष के बल चढ़ रहीं हैं?" भगवान ने कहा, "वे मेरा पालन करने वाली माता के समान है। मेरी आराधना कर उन्होंने इस प्रसिद्ध रूप को प्राप्त किया।" संपूर्ण विश्व को आशीर्वाद देने के लिए, भगवान भक्त के पास आए। वेदों को प्रदान करने वाले अपने पवित्र होठों से उन्होंने कहा, "अम्मैये!" (इस शब्द का अर्थ माँ होता है।  इस शब्द का प्रयोग सामान्यतः स्त्रियों के लिए भी किया जाता है)। कारैकाल  अम्मैय्यार उनके पवित्र चरणों में गिरकर स्तुति करते हुए बोलीं, "हे भगवान! मेरे पिता!!" प्रभु ने उनकी इच्छा पूछी। उन्होंने उनसे नित्य आनंदमय प्रेम की याचना की, जो भक्तों के लिए परम वरदान है। उन्होंने साथ ही प्रार्थना की, "मेरे प्रभु! मुझे जन्म और मृत्यु के इस चक्र से मुक्त करें। यदि कोई जन्म हो तो भी मुझे आशीर्वाद दें कि मुझे आपका शाश्वत स्मरण रहें। इसके अतिरिक्त, जब आप नृत्य करें तब मैं आपके पवित्र चरणों के तले आनंद में गाते  राहूं।" भगवान ने उन्हे सभी वरदान दिये जिनकी उन्होंने याचना की और उन्हे दक्षिण मे स्थित तिरुवालंकाडु पहुँचने की आज्ञा दी जहाँ उनके नृत्य के विषय में गाकर वे परमानंद प्राप्त करें। भगवत आदेश अनुसार अम्मैयार अपने शीर्ष के बल पर चलकर तिरुवालंकाडु आयीं। जब उन्होंने भगवान के नाद के पार नृत्य को देखा, तो आनंद के चरम सीमा में "कोंगै तिरंगी" से आरंभ करते हुए "मूत्त नरपदिकम" की रचना की। अभिनव पुष्पों के मधु से आर्द्र जटा के धारी शिव के नृत्य के दर्शन करते ही अम्मैयार को परमानंद की स्थिति प्राप्त हुई, जिसे उन्होंने "एट्टी इलवम्मिकै" तिरुपदिकम में गाया और सदैव के लिए उन पवित्र चरणों में श्रेष्ठ एवं शाश्वत स्थान प्राप्त हुआ। कारैकाल अम्मैय्यार का नित्य आनंदमय प्रेम सदैव मन में बना रहे। 

(कारैकाल अम्मैय्यार, संत तिरुज्ञान संबंधर के समय से पहले रहती थीं। यह वे महान स्त्री हैं, जिन्होंने प्रथम बार पदिकम शैली में रचना कर उसे गीत का रूप दिया था और प्रत्येक पदिकम के अंतिम पद्य में हस्ताक्षर के समान अपना चिह्न समाविष्ट किया था। तद्पश्चात कई लोगों ने इसका अनुसरण किया। इसलिए उनके द्वारा गाए पदिकम मूत्त (ज्येष्ठ) तिरुपदिकम के नाम से जाने जाते हैं।)
 

गुरु पूजा : पंगुनी / स्वाती या मीन / स्वाती 

हर हर महादेव 

63 नायनमार - महान शिव भक्तों का चरित्र 


 

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