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कण्णप्प नायनार दिव्य चरित्र

यह उनकी कथा है जिन्होंने कभी शास्त्र नहीं पढ़े पर पवित्र ग्रंथ उनकी भक्ति का बखान करती है। उनका प्रशिक्षण आखेट में था पर भगवान शिव के प्रति उनका प्रेम अतुलनीय था । तिरुज्ञान संबंधर, तिरुनावुक्करसर, सुंदरर, मणिकवाचकर, आदि शंकराचार्य, नक्कीरर और अन्य कई महान ज्ञानियों ने इन एक व्याध के सरल अद्वितीय भक्ति की भूरी भूरी प्रशंसा की है । जिनके विचार मात्र से ही पाठक भक्ति की ऊंचाइयों पर पहुंच जाता है, उनके अपूर्व प्रेम को शब्दों में अभिव्यक्त करना दिव्य कवियों के लिए भी कठिन है। तथापि, केवल प्रेम इस कथा के पुनर आख्यान के इस प्रयास को प्रेरित करता है।
 

Kannappa Nayanar - The History of Kannappa Nayanar
कन्नप्पर, जिन्होंने परम विद्या पाया!

पोत्तप्पी  राज्य को प्रकृति का आशीर्वाद था । यह राज्य हरे भरे वनों और पर्वतों से परिवृत था । इसी राज्य में रमणीय पर्वतों से घिरा उडुप्पुर नाम का गांव था। पाषाणशिलाओं पर सूखने के लिए रखे हुए मृत पशुओं और उन्हे पकडने के लिए प्रयोग किए गए जालों की गलने की गंध से वातावरण भरा हुआ था । हिरणों के नाचने और झरनों के गिरने जैसी सुखद ध्वनियों के साथ साथ "इसे मार डालो!", "पत्थर मारो!" या "छुरे से मारो!" जैसी आखेटी ध्वनियाँ भी सुनाई पड़तीं थीं । ग्वालों को छोड़कर, यहाँ के शिकारी प्राय: सभी को लूट लेते थे। वे शक्तिशाली हाथियों के समान थे जो किसी भी चुनौती के लिए तैयार थे। इन शिकारियों के हृदय में न तो दया थी न भय। उनका नेतृत्व एक साहसी नेता नागन करते थे । वे अपराध करने में प्रशिक्षित थे, मारने में उनकी अभिरुचि थी, शिकार करना उनका व्यवसाय था, धनुर्विद्या में उनकी विशेषज्ञता थी और उन्हें शिकारियों के नेता के रूप में उनके पूर्वजों द्वारा व्यवस्तित सबसे उपयुक्त कार्य मिला था। किन्तु  उन्होंने पिछले किसी जन्म में घोर तपस्या की होगी, क्योंकि वे शीघ्र ही भगवान के सबसे बड़े भक्तों में से एक के साथ संबंध बनाने वाले थे । उनकी पत्नी भी धनुर्धरों के परिवार से आती थीं और वे आभूषण के रूप में बाघों के नाखून और सांपों का चर्म पहना करती थी । उनका नाम तत्तै था।
नागन और तत्तै को लंबे समय तक कोई संतान नहीं हुई थी। जब संतान प्राप्ति के सारे मार्ग बंद हो गए, वे भगवान की ओर चले । जब कोई आशा नहीं रहती है, तब नास्तिक भी ईश्वर में विश्वास करना प्रारंभ कर देता है । अंतिम शरण के रूप में, नागन ने शमशानवासी भगवान शिव के पुत्र, कार्तिकेय से प्रार्थना की, जो भगवान शिव की कृपा के स्वरूप है । भगवान कार्तिकेय की कृपा से, तत्तै ने ऐसे पुत्र को जन्म दिया जो आगे जा कर संसार के लिए पूजनीय होगा। प्रसन्नता के आँसुओं के साथ, नागन ने अपने पुत्र को अपने हाथों में लिया मानो एक विशाल पर्वत ने काले बादल को पकड़ा हो । नागन ने इस अवसर को भव्य रूप से मनाया, भगवान कार्तिकेय को कई पशुओं की बलि दी और पूरा गाँव आनंदित था। वह अद्भुत बालक इतना शक्तिशाली था कि उसके अपने पिता को उसे पकड़ने में कठिनाई हो रही थी । इसलिए, नागन ने अपने पुत्र का नाम तिण्णन  (अर्थात् शक्तिमान्) रखा और पूरे समुदाय के कोलाहल के बीच इसकी घोषणा की।
बालक तिण्णन का वक्ष और नितंब पशुओं के शरीरों से बने आभूषणों से सुशोभित था। वे वन्य सूअर, सांप और कुत्तों को पकड़कर खेलते थे । उन्होंने अपने मीठे शैशव बातों से अपने माता-पिता को अपार सुख दिया। जब वे धनुर्विद्या सीखने की आयु पहुंचे, तो उनके पिता ने उनकी दीक्षा के लिए एक शुभ दिन का चयन किया और सभी दिशाओं में व्याध समुदाय के लोगों को एक भव्य उत्सव का निमंत्रण भेजा। सभी दिशाओं से बड़ी संख्या में व्याध समुदाय के लोग आए। वे अपने साथ रत्न, चमड़ा, हाथी-दाँत, मधु, माँस, फल और कन्द-मूल भेंट के रूप में लाए थे। उत्सव में कई पशुओं की बलि दी गई और तिण्णन के धनुष की पूजा की गई , यह वह धनुष था जिसे पूरे ब्रह्मांड को खिलाने वाले सर्वशक्तिमान भगवान शिव के लिए मांस का भोग लाने का सौभाग्य मिलने वाला था। नागन ने उत्सव के प्रत्येक दिन भव्य भोज की व्यवस्था की थी। सातवें दिन, जब सूर्य आकाश के मध्य में पहुंचा, तब उस तरुण शेर (तिण्णन) के हाथ धनुष और बाण दिया गया। वे शीघ्र ही एक कुशल धनुर्धर बन गए जो उनका वंशानुगत व्यवसाय भी था। इस प्रकार समय के साथ वर्धमान चंद्रमा के समान, तिण्णन सोलह वर्ष की आयु तक पहुँच गये ।
बढ़ती आयु के कारण नागन अपने व्याध संघ का नेतृत्व करने में अक्षम थे । उनके आसपास के वन में हाथी, हिरण और बाघ की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही थी। शिकारियों ने आकर अपने नेता को सूचित किया कि एक शिकार अभियान अनिवार्य था। नागन ने उनके साथ जाने में असमर्थता व्यक्त की और अपने स्थान पर अपने पुत्र तिण्णन को ले जाने के लिए कहा। हाँलाकि वे सभी थोड़े दुखी थे कि उनके नेता अबसे उनके साथ कभी नहीं जाएंगे, फिर भी तिण्णन के नेतृत्व में आखेट करने का एक उत्साह था। नागन ने तिण्णन के प्रथम शिकार से पूर्व वन देवताओं को प्रसन्न करने के लिए दैवज्ञ को बुलाया। इसके बाद उन्होंने तिण्णन को अपने आयु के कारण आखेट से निवृत होने के निर्णय के बारे में बताया और संघ का नेतृत्व को उन्हे सौंपा । साथ ही अपने समुदाय  को समृद्धि की ओर ले जाने के लिए प्रेरित किया । 
दूसरे दिन सूर्योदय से पहले ही तिण्णन, धनुष और तूणीर से सज्ज, महान अर्जुन के समान, अपने शिकार दल के साथ निकल पड़े । धनुष की एक टंकार से भयभीत सभी दिशाओं के वन्य मृग गहन  वन की ओर भागने लगे । शिकार दल अपने भयानक हथियारों के साथ उन पशुओं के पीछे भागे। वनचर विभिन्न मृगों के आश्रय स्थानों की जानकारी देते गए। और शिकारी इन जानवरों पर घात लगाकर आक्रमण करते थे। इस प्रकार शीघ्र मृत मृगों का ढेर लग गया । फिर तिण्णन कुछ सहयोगियों के साथ गहन वन मे प्रवेश कर गए। उन्होंने एक वन्य सूअर देखा जो जाल को चीर कर शिकारियों के तीरों से बचकर तीव्रता से वन के और भीतर भाग गया । उस शूकर से कदम केवल तिण्णन, नाणन और काडन रख सके । वराह चतुराई से बच कर उन्हें एक पर्वत की तलहटी के समीप ले गया। वह पर्वत पवित्र श्रीकालहस्ती पर्वत था जहाँ पुरातन काल में एक मकड़ी, एक सांप और एक हाथी ने भगवान शिव की पूजा की थी। वहाँ पहुंचकर एक वृक्ष के नीचे सूअर आके रुख गया। तिण्णन ने तुरंत छलांग लगाकर उस शूकर को अपने छुरे से मार डाला । तीनों को यह आभास हुआ कि वे अपने शिकारी दल से अलग हो चुके थे । तिण्णन ने काडन से उस सूअर को पकाने के लिए कहा, और स्वयं नाणन के साथ पर्वत के दूसरी ओर, स्वर्णमुखी नदी से पानी लाने चले गए । जैसे जैसे तिण्णन ने उस पर्वत के तलहटी के वन में प्रवेश किया, उनके हृदय और मन में एक अवर्णनीय भावना का उदय हुआ । नाणन ने तिण्णन को पर्वत पर कुडुमिदेवर (भगवान शिव) के मंदिर के बारे में बताया और वहां प्रार्थना करने का सुझाव दिया। इस प्रकार, तिण्णन ने भगवान शिव की ओर अपना पहला कदम बढ़ाया, जो भगवान अपने भक्तों के प्रेम के वश में रहते हैं ।
पूर्व कई जन्मों की तपस्याओं के फल स्वरूप मानो तिण्णन के हृदय में शिव के प्रति रुचि बढ़ी । पहाड़ी धाम की ओर बढ़ते बढ़ते , प्रत्येक पद के साथ रुचि स्नेह में परिवर्तित होती गई । अब तो केवल अपार प्रेम और नाणन उन्हे उस पर्वतीय मंदिर की ओर ले जा रहे थे । इससे पहले कि उन्हे हृदयों के चोर भगवान शिव के दर्शन होते, भगवान ने तिण्णन के जन्म का कारण, उनके जातीय संबंध और उनके इस जन्म को भी चुराकर सभी पाश तोड़ दिये ।
उन्होंने उन्हे देखा! उन्होंने अपनी आँखों से कुडुमीदेवर के उस अद्भुत रूप को पी लिया। उनके हृदय में प्रेम भर गया । उन्होंने स्वयं पर नियंत्रण खो दिया। प्रेम के वश में तिण्णन ने दौड़कर प्रभु को गले लगाया। परमानंद से तिण्णन के शरीर का रोम-रोम खड़ा हो गया । पर फिर चिंता ने उस पर वश पा लिया "हे भगवान! हा ! वन्य पशुओं से भरे इस घने वन में, आपकी रक्षा करने वाला कोई नहीं है! आप तो बिलकुल अकेले खड़े हो! ऐसा नहीं हो सकता!" इस प्रकार तिण्णन ने कहा। उन्हे अपने धनुष के सखलन का भी बोध नहीं हुआ। उन्होंने नाणन से पूछा, "यहाँ कौन आता होगा और इन हरे पत्तों और पुष्पों को भगवान को अर्पित कौन करता होगा ?" नाणन ने उत्तर दिया “एक बार जब मैं तुम्हारे पिता के साथ शिकार के लिए आया था, तो हमने देखा कि एक मुनिवर ने भगवान को स्नान कराया और उन्हें पुष्पों से सजाया। शायद उन्होंने आज भी ऐसा ही किया होगा ।” तिण्णन समझ गए कि अब तक श्रीकालहस्ती के देवता के लिए किस प्रकार की पूजा की जा रही थी। वह चिंतित थे  “अरे! मेरे भगवान अकेले है! उन्हे मांस खिलाने वाला भी कोई नहीं है! मैं उन्हे यहाँ अकेले कैसे छोड़ सकता हूँ? मुझे उनके भोजन के लिए कुछ अच्छे पशुओं का मांस लाना चाहिए!”
तिण्णन मांस लेने के लिए मुड़ते, पर फिर अपने भगवान को देखने के लिए वापस दौड़ते । वे ऐसी कई बार कर चुके थे।  जैसे एक गाय के अपने बछड़े को अपनी दृष्टि से बाहर नहीं जाने देना चाहती है वैसे ही अवस्था तिण्णन की भी थी। एक क्षण वे कहते, “मेरे प्रभु ! मैं आपको उत्तम से उत्तम मांस खाने को दूँगा।” किन्तु अगले ही पल उन्हें चिंता होती, “मैं आपको यहाँ अकेले कैसे छोड़ सकता हूँ? परन्तु मैं यहाँ भी रहने में असमर्थ हूँ क्योंकि आप भूखे है।” अंत में उन्होंने अपने आप को सांत्वना देकर, भगवान, जिन्हें किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं थी, के लिए आवश्यक वस्तुएँ लाने चले गये। सांसारिक वस्तुओं की इच्छा जल चुकी थी। अब केवल भगवान कामांतक, के लिए प्रेम के साथ, तिण्णन स्वर्णमुखी नदी के तट पर उद्यान की ओर चले गये । वहाँ काडन उन्हे यह बताने आया कि जिस सूअर का उन्होंने शिकार किया था वह पक चुका था । नाणन ने काडन को भगवान को देखने के पश्चात तिण्णन की अवस्था के बारे में बताया – “वह अब शिकारियों का नेता नहीं रहा, बल्कि भगवान कुडुमीदेवर का दास है ।” काडन अचंभित रह गया। फिर तिण्णन ने एक तीर से पके हुए सूअर के शरीर के सबसे अच्छे भागों का चयन किया। सबसे अच्छे भागों का चयन करने के लिए प्रत्येक खंड का उन्होंने स्वाद लिया और एक पत्ते के कटोरे में एकत्रित किया।
नाणन और काडन इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि तिण्णन उन्मत हो गया था और उन्होंने अपने अन्य साथियों से कहा, “उसने मांस के सबसे अच्छे भागों का स्वाद लिया, किन्तु नहीं खाया, बल्कि उसने उन्हें एक कटोरे में एकत्रित किया। वह निस्संदेह भूखा होगा। न वह भोजन करता हैं और न हमें खाने देता हैं। आइए हम नागन (उसके पिता) और अन्य लोगों को यहाँ ले आए ताकि यह पता चले कि उसके साथ क्या हो रहा है।” तिण्णन को इस बात का कोई ध्यान नहीं था कि उनके आसपास क्या हो रहा था । उन्होंने मांस के छोटे खंडों को अपने हाथ में लिया, भगवान के अभिषेक के लिए नदी का जल अपने मुँह में लिया और सुंदर पुष्पों का चयन कर अपने ही केशों में एकत्रित किया । उन्हे बढ़ी चिन्ता हो रही थी कि पर्वत के शिखर पर उनके प्रभु बहुत भूखे होंगे। उन्होंने अपने पैर से भगवान कुडुमीदेवर के शीर्ष से निर्माल्य हटाया । अपने मुँह मे लाए गए पवित्र जल से भगवान का अभिषेक किया । फिर उन्होंने अपने केशों में लाये हुए पुष्पों से भगवान का श्रृंगार किया। उन्होंने भगवान को प्रणाम किया और सावधानी से चुने हुए भोजन को अर्पित किया । किन्तु अब भी वे  संतुष्ट नहीं हुए । वे प्रभु को खाने के लिए और भी बहुत कुछ देना चाहते थे । आज इस भक्ति की पराकाष्ठा के साक्षी सूर्यदेव हाथ जोड़कर अस्तमन हो गया। निडर तिण्णन को अब डर था कि कहीं कोई वन्य पशु आकर श्रीकालहस्ती भगवान को चोट न पहुँचा दे। इसलिए, वे अपने धनुष और बाण के साथ पूरी रात उनके पास जागते रहे । जगत में तिण्णन की ख्याति ये हुई कि वे एक ही ऐसे व्यक्ति थे जो इस पूरी सृष्टि की संरक्षक करने वाले प्रभु की रक्षा करने लिए खड़े थे । अगले दिन प्रातः जब सूरज निकला, तो उन्होंने भगवान को दंडवत प्रणाम किया और उस दिने के पूजा के लिए सामग्री एकत्रित करने के लिए निकल गए । 
जैसे ही तिण्णन शिकार के लिए निकले, अपनी दैनिक पूजा के लिए मुनि शिवगोचर्य आए। वेदागम के नियम अनुसार श्रीकालहस्ती भगवान की दैनिक पूजा करने वाले, शिवभक्त और मुनि, शिवगोचर्य, उस पर्वत पर शास्त्रोक्त विधि के अनुसार भगवान की पूजा करते थे।  वे प्रभु के समक्ष बिखरी अस्थियाँ और मांस देखकर स्तंभित रह गये । वे भयभीत होकर चीके, “यह उन भयानक शिकारियों का काम होना चाहिए!” उन्होंने उस स्थान का ध्यान से प्रक्षालित किया। फिर वे नदी में स्नान करके आए । शास्त्रों में निषिद्ध वस्तुओं का उपयोग करने से वेदी की शुद्धिकरण अनिवार्य हो जाती है। इसी का अनुसरण कर, मुनिवर ने उस स्थान को शुद्ध किया और लिंगाभिषेक किया। फिर पुष्प अर्पण किए, दीपक जलाया और भगवान के नाम का जाप कर के अपनी दैनिक पूजा फिर से प्रारम्भ किया । उन्होंने अद्वितीय भगवान को कई बार प्रणाम किया और अपने आश्रम लौट आए।
शिकारी तिण्णन ने हिरण, वन्य सूकर और अन्य मृगों का शिकार सूर्यास्त तक किया । फिर उन्होंने वन से लकड़ी एकत्रित की और मांस पकाने के लिए आग जलाई। उन्होंने हर उस माँस खंड को चखा जिसे उन्होंने ध्यान से चुना था ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि भगवान को सबसे अच्छा भोग अर्पित हो । उन्होंने खाने का स्वाद बढ़ाने के लिए उसके ऊपर मधु भी डाला। पूर्व दिन के समान ही उन्होंने भगवान की पूजा के लिए सभी सामग्री एकत्रित किया । पर सर्वोच्च उपहार जो तिण्णन अपने महादेव के लिए ले जा रहे थे , वह था अपार प्रेम । पूर्व दिन की भांति उन्होंने मुनिवर द्वारा अर्पित पुष्पों को हटाया । उन्होंने भगवान को सबसे स्वादिष्ट हिरण का मांस खिलाया। जिस प्रकार वैदिक संस्कारों में अग्नि के जिह्वा से ग्रहण किए गए घी का आनंद देवता लेते है, उसी प्रकार तिण्णन के जिह्वा द्वारा चखे गये भोजन का आनंद उनके भगवान ले रहे थे । तिण्णन रात को इसलिए नहीं सोते थे कि वे अपने प्रिय परमेश्वर की रक्षा कर सके। यह घटना क्रम कुछ दिनों तक चलता रहा। तिण्णन दिन में शिकार के लिए जाते थे और मुनिवर उस स्थान को पवित्र करने के लिए आते थे और उनकी पूजा करते थे। इस बीच नाणन और काडन तिण्णन के पिता और अन्य लोगों को ले आए । किन्तु कोई भी तिण्णन को वापस आने के लिए मना नहीं सका । इस संसार की कोई भी शक्ति उन्हें परमेश्वर के दैदीप्यमान चरणों से दूर नहीं कर सकती थी। वे इस जगत के अनिरंतर सुख की तुलना में निरंतर परमानंद का चयन कर चुके थे ।
जबकि हमारे नायनार ने महादेव की पूजा वैसे की जैसे वे जानते थे, मुनिवर शिवगोचर्य ने इसे एक समस्या माना और समाधान के लिए हताश थे। उन्होंने प्रभु से प्रार्थना की वे उस व्यक्ति को प्रत्यक्ष करे जो उस स्थान को प्रतिदिन अपवित्र कर रहा था। नायनार के सच्चे प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए, अनामन् शिव, जिनकी प्रशंसा सहस्र पवित्र नामों से की जाती है, मुनिवर के स्वप्न में आए, और कहा, “उसे एक दुष्ट मत समझो। उसका रूप मेरे लिए प्रेम से भरा है, उसका मन केवल मेरे बारे में सोचता है, उसके कर्म केवल मुझे प्रसन्न करने के लिए है। जो जल वह मुझ पर थूकता है वह गंगा के जल से भी पवित्र है और जो पुष्प वह अपने केशों से निकालकर अर्पित करता है वह देवताओं द्वारा अर्पित किए गए पुष्पों भी से अधिक पवित्र है। उसके सभी कर्म शुद्ध प्रेम से करण  हैं। यदि तुम कल भक्ति के इस उच्चतम रूप को देखना चाहते हो तो मंदिर में छिप जाओ।” भय और विस्मय की मिश्रित भावनाओं के साथ, मुनिवर रात भर सो नहीं सके । अगले दिन सूर्य उदय होते ही वे अपने आश्रम से निकले । उन्होंने स्वर्णमुखी में स्नान किया और प्रतिदिन के समान भगवान श्रीकालहस्ती ईश्वर की पूजा की। पर आज वे घर नहीं लौटे, बल्कि भगवान के आदेशानुसार मंदिर के अंदर छिपकर "दुष्ट" की प्रतीक्षा कर रहे थे ।
मांस से भगवान की पूजा करने का यह क्रम छह दिनों से चल रहा था। सातवें दिन, प्रतिदिन के समान नायनार ने पूजा की अपनी सामान्य वस्तुओं को इकट्ठा किया। आज तिण्णन स्पष्ट रूप से आकुल थे और उन्हे देर से पहुँचने का एक विचित्र अनुभव हो रहा था। उन्होंने मार्ग में कुछ अपशकुन देखे और इस डर से वे तीव्रता से भागे कि कहीं उनके भगवान पर कोई विपत्ति न आ गई हो । शिवगोचर्य  को नायनार का प्रेम दिखाने के लिए, भगवान के दाहिनी आँख से रक्त बहने लगा । भगवन को देखते ही उनके के हाथों से धनुष और भोजन गिर गया, उनपर संत्रास और विषाद छा गया। भगवान की आंखों से रक्त बहता देखकर तिण्णन चेतना शून्य हो गए । वे उनके पास दौड़े और रक्त पोंछने का प्रयास किया , किन्तु रक्त बहना बंद नहीं हुआ। उन्होंने अपना धनुष लिया और अपराधी को खोजने की चेष्टा की, परंतु वहाँ न ही मनुष्य था न ही कोई पशु । उनकी आंखों से अब आंसू बह रहे थे और वे विलाप करने लगे । उन्होंने भगवान की आँख की चिकित्सा के लिए वन में जड़ी-बूटियों की खोज शुरू कर दी। पर औषधि से अपेक्षित परिणाम नहीं हुआ। यदि यह एक वास्तविक घाव होता, तो अब तक यह ठीक होने के संकेत दिखा चुका होता।  किन्तु यह तो भगवान की अपरंपार लीला थी जो एक छोटे से विषय को छुपा रहे थे ताकि एक बडा विषय संसार के समक्ष आ सके।
जब वे सोच रहे थे कि वे भगवान के आँख के रक्त को कैसे रोक सकते है, तो तिण्णन को एक पुरानी कहावत याद आई "आँख के बदले आँख"। उन्होंने तुरंत अपने तीक्ष्ण बाण को लेकर अपनी स्वयं की आँख को ऐंठ कर उसे प्रभु के रक्तरंजित नेत्र के स्थान पर रख दिया। वे हर्षित हुए कि वे रक्त को रोकने मे सफल हुए । क्या वे भक्ति का स्तर स्थापित कर रहे थे? जहाँ देवता और ऋषि उनके पास वरदान माँगने आते हैं, यहाँ ये मनुष्य थे जिन्होंने भगवान शिव को अपनी आँख देकर आनंद से नाच रहे थे । वे केवल एक व्याध जाति से थे , फिर भी उनके कर्म स्वर्ग के वासियों के कर्म से अधिक पवित्र था। अब महादेव संसार को परम भक्ति का उदाहरण देना चाहते थे। जैसे ही उनकी दाहिनी आँख से रक्त बहना बंद हुआ, उनकी बाईं आँख से रक्त बहने लगा। नायनार क्षण भर के लिए चौंक गये । लेकिन अब वे उपाय जान गये थे और उन्होंने अपने आप से कहा “मैं इसका उपचार जानता हूँ। मेरी एक और आँख है। इससे यह ठीक हो जाना चाहिए!” किन्तु जब वे अपनी आँख निकालने ही वाले थे, तो उन्हे एक कठिनाई की अनुभूति हुई। जब वे शेष आँख को खोकर पूरी तरह से दृष्टिहीन हो जाएंगे तो वे आँख को शिवमूर्ति पर कैसे रखेंगे? इसलिए, उन्होंने अपना पैर उठाया और भगवान की मूर्ति के आँख के स्थान पर रख दिया । फिर उन्होंने अपनी दूसरी आँख निकालने के लिए अपना तीर उठाया। शब्द इस कृत्य का वर्णन नहीं कर सकते, फिर भी यदि हम कहें कि "वे भक्ति स्वरूप थे" तो क्या यह पर्याप्त प्रशंसा होगी? इस महान कार्य को स्वयं प्रभु सहन नहीं कर पा रहे थे। वे नायनार का हाथ पकड़कर उनकी आँख ऐंठने से रोकने के लिए उसी स्थान पर प्रकट हुए । वे उच्चस्वर मे चिल्लाये , "ओह रुको कण्णप्प! कण्णप्प रुको !! रुको कण्णप्प!!!” वे मुनिवर, जो मंदिर में छिपे हुए थे, उन्होंने उन भक्त के महान प्रेम और भगवान का अनुग्रह देखा। भगवान ने मांसाहार को प्रसाद के रूप में केवल उस भक्ति के कारण स्वीकार किया जो त्यागमयी प्रेम की पराकाष्ठा थी। "ओह! अद्वितीय! सदैव मेरे दाहिनी ओर रहो ” इस प्रकार महादेव ने आशीर्वाद दिया। क्या सर्वज्ञ परमेश्वर के आशीर्वाद से बढ़कर कुछ है ? कण्णप्प नायनार का रूप धारण करने वाली स्वयं भक्ति हमारे मन में सदैव बनी रहे।
 

गुरु पूजा : तै / मिरुगसीरिसम या मकर / मृगशीर्ष  

हर हर महादेव 

 

63 नायनमार - महान शिव भक्तों का चरित्र 


 

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