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माहेश्वर मूर्थम ध्यान श्लोका - Dyana slokas of Maheshwara moortham in Marati (Meditation hymns on the Forms of Lord shiva)

(Meditation hymns on the Forms of Lord shiva)

माहेश्वर मूर्थम ध्यान श्लोका

Please see Forms of Lord shiva for the explanation of each of these verses in English with the depictions.

The transliteration of the shlokas are not exact due to the following resons.

1. These shlokas have been put here by transliterating from a tamiz source. Due to the vast difference in character set in thamiz and sa.nskR^itam.h possibility of words misspelt are quite possible.

2. The shlokas for some of the mUrtis are not present as they were missing in the thamiz source that was used for this work. (nIlakaNTar, li.ngodbhavar, sukAsanar). 

Help of Sree Hari is the major support behind putting these shlokas in sa.nskR^itam.h from thamiz text and in the translation into English. If you have these shlokas or know it, please send corrections. Also if you can send the meanings for the words missing in the translation or any wrong meaning given, it will be quite useful.

भिक्शाटनर

शुक्लापम.ह शुभलोचनम.ह दूर्वांकुरम.ह दक्शिणे
वामेशूल कपाल सम्युतकरम.ह सत्पादुकम.ह पादयोः ।
लम्बत पिण्‍ग जटाधरम.ह शशिधरम.ह दक्शे मृगम.ह वामहे
भिक्शा पात्रधरम.ह सकुण्डपिठरम.ह भिक्शाटनेशम.ह भजे ॥

कामारि

भस्मोद.ह्धूळित विग्रहम.ह शशिधरम.ह गंगाफणि मण्डितम.ह
टंकम.ह कृश्ह्णमृगम.ह तथानममलम.ह वीरासने सुस्थितम.ह ।
अंगे सव्यकरे परम.ह करतलम.ह विन्यस्य योगेरतम.ह
व्याघ्र त्वक्वसनम.ह ललाट जद्रुशा दग्धस्मरम.ह त्वाम.ह भजे ॥

कालारि

सिन्दूरापरम.ह त्रिनेत्रम.ह युगभुज सहितम.ह ह्युत्रुतम.ह शूलहस्तम.ह
पाशम.ह सुशिवहन्तम.ह परशुमपितथा भीष्मदंश्ह्ट्रम.ह सुवक्त्रम.ह ।
पादम.ह कुञ्चित वाममुत्थेरुततलम.ह कालस्य वक्शस्थले
न्यस्त्वा पिण्‍ग जटाधरम.ह पशुपतिम.ह कालान्तकम.ह नौम्यहम.ह ॥

कल्याण सुंदरर

सिन्दूरापरम.ह त्रिनेत्रम.ह युगभुजसहितम.ह हारकेयूर भूश्हम.ह
दिव्यैर वस्त्रैर वृतांगम.ह वरसमुचितलसत.ह वेश्हयुक्तम.ह शुभांगम.ह ।
वन्दे कल्याणमूर्तिम.ह करतलकमले देविहस्तम.ह तथानम.ह
हस्ते टंकम मृगञ्च तततमधवरम.ह बद्दगंगेन्दु चूडम.ह ॥

ऋषभारूढर

सव्येस्यात.ह वक्रदण्डान्वित कटक करम.ह गोपतेः पृश्ह्ठ संस्थम.ह
वामस्यार्तम.ह सदक्शम.ह वरकरयुगळे टंक कृश्णम.ह तथानम.ह ।
फालस्थाक्शम.ह प्रसन्नम.ह त्रिनयन सहितम.ह बद्द वेणी किरीटम.ह
वामे गौर्या समेतम.ह नमत शुभकरम.ह तं वृश्हारूढमीशम.ह ॥

चंद्र शेखरर

अभय वरद हस्तम.ह सौम्य शृंगार भावम.ह
विपुल वदन नेत्रम.ह चन्द्र बिंबांग मौळिम.ह ।
ऋजुतनु समपादस्थानकम.ह विद्रुमापम.ह
हरिण परशु पाणिम.ह पद्मपीठोपरिस्थम.ह ॥

उमा महेश्वरर

धवळाप सुखासन सन्निहितम.ह 
मृग डिंबक टंक वराभयदम.ह ।
सुमुखम.ह परमुत्पलधृक.ह वरदम.ह 
उमया सहितम.ह प्रणमामि भवम.ह ॥

नटराजर

एकास्यन्तु चतुर्भुजम.ह त्रिनयनम.ह वामेतु धुर्धूरकम.ह
चन्द्रम.ह पत्र शिखि प्रसारित करम.ह चोर्ध्वम.ह पदम.ह कुञ्चितम.ह ।
सव्ये स्वस्तिक कुण्डलम.ह डमरुकम.ह गंगाभयेपिप्रदम.ह 
वन्दे कीर्णजटम.ह नटेशमनिशम.ह ह्यपस्मार देहेस्थितम.ह ॥

त्रिपुरारि

रक्तापम.ह परिपूर्ण चन्द्रवदनम.ह कृश्ह्णम.ह मृगम.ह कार्मुकम.ह
वामे सव्यकरे शरञ्च तथतम.ह टंकञ्च देव्यायुतम.ह ।
गंगाचन्द्र कलाधरम.ह हरिविरिञ्चाद्यैस्सदा सेवितम.ह
हासैर्दग्ध पुरत्रयम.ह त्रिभुवनाधीशम.ह पुरारिम.ह भजे ॥

जलन्दरारि

रक्तापम.ह उग्र गमनम.ह त्रिविलोचनाभयम.ह
टंकासि कृश्ह्ण मृग चाप सुशोभि हस्तम.ह ।
भूमिस्थ चक्र धरणोद्ग जलन्धरस्य 
कण्ठग्न माभज जलन्धर हरस्वरूपम.ह ॥

मातंगारि

स्थित्वा हस्ति शिरस्त दक्शचरणम.ह वामांग क्शोतृदम.ह
पुच्चोर्त्वावृत चर्म उद्धृतकरम.ह शूलासि शरुण्‍गोज्वलम.ह ।
टंकम.ह कृश्ह्णम.ह धरम.ह वरकरम.ह भीश्ह्माननेन्दु प्रभम.ह
वामोमाति भयोन्मुखी सुतयुतम.ह सूच्याट्य हस्तम.ह हरम.ह ॥

कराळर

चतुर्भुजम.ह त्रिनेत्रञ्च जटामकुट सम्युतम.ह 
दक्शिणे खड्गबाणञ्च वामे चाप गदाधरम.ह ।
दम्श्ह्ट्रा कराळ वदनम.ह भीमम.ह भैरव गर्जितम.ह
भद्रकाळि समयुक्तम.ह कराळम.ह हृदि भावये ॥

शण्‍कर नारायणर

सव्यांगे विदृमापम.ह शशिधर मकुटम.ह भस्मरुद्राक्श भूश्हम.ह
वामांगे श्यामलापम.ह मणिमकुटयुतम.ह पीतवस्त्रादि शोभम.ह ।
सव्ये टंकाभयम.ह स्यातितर करयुगे शंख कौमोदकी च
किंचिल्ललाट नेत्रम.ह हरिहरवपुश्हम.ह संततम.ह नौमि शंभुम.ह ॥

अर्ध नारीश्वरर

पुम्स्त्रीरूपधरम.ह तनौशशि जटा टंकारुणापम.ह पणिम.ह
व्याघ्र त्वक्वसनम.ह प्रकोश्ह्ठ वृश्हभम.ह वक्रांघ्रिकम.ह दक्शिणे ।
वामे श्यामल वरोत्पलालककुच क्शौमर्जु पादांबुजम.ह
द.ह्हेम विभूश्हणाति रुचिरम वंदे अर्धनारीश्वरम.ह ॥

किरातर

कृश्ह्णांगम.ह द्विभुजम.ह धनुच्चरधरम.ह मुत्तालकम.ह सुस्थितम.ह
क्रूराक्शिद्वय सम्युतम.ह विपुलसत्वक्त्रम.ह ह्युरोविस्तृतम.ह ।
शीर्षे पिंच्हधरम.ह सुगन्ध कुसुमम.ह शार्दूल चर्माम्बरम.ह
बद्द व्याळ विराजितोधरमहम.ह ध्यायेत.ह किरातम.ह हरम.ह ॥

कंकाळर

रक्तापम.ह स्मितवक्त्रम.ह इन्दुमकुटम.ह वामेतु दोर्दण्डके
त्र्यक्शम.ह वेदकरांबुजम.ह सदधृतेः कंकाळ वीणाधरम.ह ।
सव्ये यश्ह्टिधरम.ह परे डमरुकम.ह सव्यापसव्य क्रमात.ह
टंकम.ह कृश्ह्णमृगम.ह कंकाळदेवम.ह भजे ॥

चण्डेश अनुग्रहर

चण्डेशम.ह पीतवर्णम.ह युगकरसहितम.ह दक्शहस्तेरत टंकम.ह
पिप्राणम.ह कृणसारम.ह वरकर सहितम.ह पार्वती वामभागम.ह ।
चण्डेशस्योत.ह तमांगम.ह प्रतिनिहितकरम.ह दक्शभागे त्रिनेत्रम.ह
सर्वालण्‍कार युक्तम.ह शशिशकलधरम.ह गंगयायुक्त मीडे ॥

चक्र प्रदर

विश्ह्णुस्द्वीश पुरस्थितो रंजलिकरो देवस्य पादाब्जयोः
अभ्यर्च्याक्शिलसत.ह सहस्रकमलम.ह सम्प्राप्तवान.ह ईश्वरात.ह ।
यस्माच्चक्रमतोवरम.ह पशुपतेः पद्माक्श इत्याघ्य़या
टंकम.ह कृश्ह्णमृगम.ह वरम.ह परकरात.ह चक्रप्रदम.ह तम.ह भजे ॥

सह उमा स्कंदर

उद्यत.ह भानुनिभम.ह चतुश्ह्करयुतम.ह केयूरहारैर्युतम.ह
दिव्यम.ह वस्त्रधरम.ह जटामकुटिनम.ह संशोभि नेत्रत्रयम.ह ।
वामे गौर्युतम.ह सुगन्धमुभयोर मध्ये कुमारम.ह स्थितम.ह
सोमास्कंद विभुम.ह मृगाभयवरम.ह टंकम.ह तथानम.ह भजे ॥

एकपादर

ध्यायेत.ह कोटिरविप्रम.ह त्रिनयनम.ह शीताम्शु गंगाधरम.ह
हस्ते टंकम.ह मृगम.ह वराभयकरम.ह पादैकयुक्तम.ह विभुम.ह ।
शम्भोर्दक्शिण वामगक्शभुजयोर.ह ब्रह्माच्युताभ्यांयुतम.ह
तत्तल्लक्श्ण मायुधैः परिवृतम.ह हस्तत्वयाट याञ्जलिम.ह ॥

विघ्नेश अनुग्रहर

टंकम कृश्णमृगम.ह तथानममलम.ह प्रालम्बि सव्यांघ्रिहम.ह
वामे निधृतपाद मिन्दु सदृशम.ह त्रयक्शम.ह जटाशेखरम.ह ।
वामांगे धृत विघ्नराजमितरम.ह तन्मूर्ध्नि विन्यस्यतत.ह
प्रीत्यानुग्रहम.ह त्रिपुण्ड्रधरणम.ह विघ्नप्रसादम.ह भजे ॥

दक्शिणामूर्ति

पादेनाक्रम्य भूतम.ह तदुपरिगुणितम.ह पादमेकम.ह निधाय
व्याकुर्वन.ह सर्वशब्दान.ह निजकटक महीभागबाजाम.ह मृगाषीणाम.ह ।
व्याळम.ह व्याख्यानमुद्राम.ह हुतवहकलिकाम.ह पुस्तकम.ह चाक्शमालाम.ह
बिभ्रत दोर्पिस्चतुर्भिस.ह स्फुरतु ममपुरो दक्शिणामूर्तिरीशः ॥

श्री नीलकण्ठर

अभयवरद हस्तम.ह टंक सारण्‍ग युक्तम.ह
शशिधरमहिभूषम पीत वस्त्रम त्रिनेत्रम ।
शिवमसितकळाट्यम तम वृषारूढ देवम
विषहरणक मीशम चित्र पिञ्च्हाट्य रूपम ॥

सुखासनर

शान्तम श्वेतम त्रिनेत्रम रसभुजसहितम कुण्डलोत्पासि कर्णम
दण्डम घण्टाम कुरङ्गम.ह्परशु पणिधराभीतिकम दशवामैः ।
पिप्राणम वामपादम शयितमथपरम लम्बिभूतस्त पादम
वामे गौर्यासमेदम शशिधरमकुटम तम सुखासीनमीडे ॥

लिङ्गोद्भवर

देवम गर्भगृहस्य मानकलिते लिङ्गे जटाशेखरम
कट्यासक्तकरम परैस्च तततम कृष्णम मृगञ चाभयम ।
सव्ये टंकममेय पादमकुटे ब्रह्माच्युताभ्याम युतम
ह्यूर्ध्वातस्थित हंस कोलममलम लिङ्गोद्भवम भावये ॥

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